लेखक: परमजीत सिंह कैरे
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किसी भी समाज या राजनीति में जब चरित्र की नींव ही कमज़ोर हो जाए, तो वहाँ उसूल महज़ कागज़ के टुकड़े बनकर रह जाते हैं। ज़रा सोचकर देखिए—कल तक जो राजनीतिक नेता मंचों पर पूरी ताकत से अड़-अड़कर विरोधी पार्टियों को कोसते नहीं थकते थे और अपनी पार्टी को ‘माँ-पार्टी’ कहकर सीने से लगाते थे, वही नुमाइंदे चुनाव नज़दीक आते ही पाला क्यों बदल लेते हैं? जिस पार्टी को वे कल तक अपनी ‘माँ’ कहते थे, रातों-रात उसे छोड़कर दूसरे खेमे में जाने के बाद वही ‘माँ’ उन्हें बुरी और भ्रष्ट कैसे नज़र आने लगती है?
आख़िर क्या जो इंसान अपनी ‘माँ-पार्टी’ के साथ ही गद्दार बन जाए, उसे असल बेटा कहलाने का कोई हक़ है? अगर कल तक वह पार्टी दूध की धुली थी, तो आज अचानक उसमें ऐब कैसे पैदा हो गए? और जिस पार्टी को वे कल तक कोसा करते थे, वहाँ पैर रखते ही वे खुद को ‘दूध का धुला’ कैसे महसूस करने लगते हैं? क्या इस तरह माँ जैसी पार्टी की इज़्ज़त को तार-तार करना राजनीतिक बेशर्मी की पराकाष्ठा नहीं है? ये सवाल किसी की निंदा करने के लिए नहीं, बल्कि इन नेताओं को उनका असली चेहरा दिखाने और उनकी सोई हुई ज़मीर को झकझोरने के लिए हैं।
”कल तक जो कसमें खाते थे इंकलाब की,
आज तख्त की खातिर बदल लीं वो वफाएँ हैं!”
पंजाब समेत पाँच राज्यों के विधानसभा चुनावों का अभी औपचारिक बिगुल नहीं बजा है, लेकिन राजनीतिक गलियारों में अवसरवादिता का जो बाज़ार गर्म है, उसने राजनीति की रूह को झकझोर कर रख दिया है। चुनाव का मौसम आने से पहले ही सियासी परिंदों की तरह घोंसले बदलने वाले इन नेताओं ने अपने असली नकाबपोश चेहरे बेनक़ाब कर दिए हैं। हमारी राजनीति का यह घटिया चरित्र साफ़ आईना दिखाता है कि यहाँ न कोई सिद्धांत है और न ही कोई विचारधारा; यहाँ सिर्फ कुर्सी की हवस और सौदेबाज़ी की मंडी है।
”दाग़ अपने छुपाने के लिए जब मोहरे बदलते हैं,
कानून के हाथों से बचने के लिए ऐसे रंग ढलते हैं!”
सबसे बड़ा सवाल यह है कि अकाली दल, कांग्रेस और आम आदमी पार्टी जैसी जमातों के नेता भाजपा की तरफ इस कदर अंधे होकर क्यों दौड़ रहे हैं? क्या यह सिर्फ वैचारिक बदलाव है, या इसके पीछे अपने काले कारनामों को छुपाने और केंद्रीय जाँच एजेंसियों (ED और CBI) की तलवार से अपनी गर्दन बचाने की कायरतापूर्ण भगदड़ है? अगर कोई बेकसूर है, तो उसे किसी भी जाँच से घबराने की क्या ज़रूरत है? लेकिन अगर ज़मीर दागी है, तो पार्टी का लिबास बदलने से न तो गुनाह धुलते हैं और न ही कानून की गिरफ्त से बचा जा सकता है।
खास तौर पर ‘आम आदमी पार्टी’, जिसने पारंपरिक राजनीति को जड़ से उखाड़ने और भ्रष्टाचार को मिटाने के बड़े-बड़े दावे किए थे, उसके अपने नुमाइंदों का ही टिकटों और मलाई के लिए पार्टी की पीठ दिखाकर भाग जाना इसके सारे दावों की पोल खोल देता है। सिर्फ नाम के आगे ‘आम’ लगाने से कोई ज़मीर पाक-साफ नहीं हो जाता।
”सिर्फ चरित्र का मातम नहीं, यह मौत ज़मीर की है,
सियासी मंडी में हर सौदा नफे-नुकसान का है!”
पर इस तमाशे में असल गुनहगार कौन है? आज पंजाब के मतदाताओं को भी आईने में अपना अक्स देखने की ज़रूरत है। यदि आप अपने हाथों से जिताकर भेजे हुए नुमाइंदों या पैराशूट के ज़रिए उतरने इन अवसरवादियों की चालों को देखकर भी अपने ज़ेहन में कोई सवाल पैदा नहीं करते, तो फिर समझ लीजिए कि आप ज़िंदा लाशें (मुर्दे) हैं!
”जो ज़ुल्म और दल-बदली पर सवाल न कर पाएँ,
वो मुर्दों की बस्ती में ही गिने जाएँ!”
याद रखिए, मुर्दों का अपना कोई बल या ताक़त नहीं होती और हुकूमतें मुर्दों को जैसे चाहती हैं नचाती और बेच देती हैं। अब वक़्त आ गया है कि मतदाता अपने दिमाग के दरवाज़े खोले और इन नकाबपोश चेहरों को पहचाने। अगर आज भी आपने इन दल-बदलुओं को कटघरे में खड़ा नहीं किया, तो आपके वोट के अधिकार की कोई अहमियत नहीं रह जाएगी।
”घोंसला बदलने से नहीं मिटते गुनाह पुराने,
उठो मतदाताओं! अब अपने कातिल चेहरे पहचानो!”
जो नेता जनता के वोटों के साथ विश्वासघात करके अपनी सहूलियत के मुताबिक पार्टियाँ बदलते हैं, उन्हें अब जनता की अदालत में सख्त जवाबदेह बनाना ही होगा। आज के राजनीतिक हालात का सच्चा निचोड़ यही है—पार्टी का लिबास बदलने से न तो पुराने पाप धुलते हैं और न ही जवाबदेही से बचा जा सकता है, बशर्ते मतदाता मुर्दों की तरह चुप रहने के बजाय अपनी बेदारी (जागरूकता) का सबूत दें!


