बरनाला,6 फरवरी (परमजीत सिंह कैरे)
नगर सुधार ट्रस्ट बरनाला एक बार फिर कानून और इंसाफ़ के कटघरे में खड़ा नज़र आ रहा है। 25 एकड़ स्कीम में पहले वर्षों से रह रहे झुग्गी-झोंपड़ी निवासियों को उजाड़ने के बाद अब ट्रस्ट द्वारा माननीय हाईकोर्ट के स्पष्ट आदेशों की अवहेलना करते हुए करीब 100 हरे-भरे पेड़ों को जड़ों से उखाड़ दिया गया है।
हैरानीजनक और गंभीर बात यह है कि हाईकोर्ट द्वारा पूरे पंजाब में पेड़ काटने या उखाड़ने पर पूरी तरह रोक लगाए जाने के बावजूद ट्रस्ट अधिकारियों ने दिन-दहाड़े पेड़ों का कत्ल कर डाला। विश्वसनीय सूत्रों के अनुसार इस संबंध में न तो वन विभाग से कोई अनुमति ली गई और न ही किसी प्रकार की पर्यावरणीय असेसमेंट या सर्वे करवाया गया।
गौरतलब है कि कुछ दिन पहले इसी स्कीम में ठंड के मौसम के दौरान झुग्गियों में रहने वाले परिवारों को बिना किसी पुनर्वास योजना के उजाड़ दिया गया था, जिसके चलते ट्रस्ट को जन संगठनों और समाजसेवियों के तीखे विरोध का सामना करना पड़ा। अब पेड़ों की कटाई कर ट्रस्ट ने पर्यावरण प्रेमियों की भावनाओं से भी सीधा खिलवाड़ किया है।
जब पेड़ों की कटाई की तस्वीरें और वीडियो सोशल मीडिया पर वायरल हुईं तो शहर के पर्यावरण प्रेमियों ने इस कार्रवाई को आने वाली पीढ़ियों के भविष्य के लिए घातक करार दिया। मामले की गंभीरता को देखते हुए वन रेंज ऑफिसर बरनाला के कर्मचारी मौके पर पहुंचे और पेड़ों की संख्या की जांच के लिए तस्वीरें व वीडियो तैयार किए।
ट्रस्ट के इंजीनियर इमरान भट्टी से संपर्क करने की सभी कोशिशें नाकाम रहीं, जबकि कार्य साधक अधिकारी राजेश कुमार ने मामले से साफ़ तौर पर अनजान होने की बात कहकर अपनी ज़िम्मेदारी से पल्ला झाड़ लिया।
पर्यावरण प्रेमी गुरप्रीत सिंह कानेके ने ट्रस्ट अधिकारियों और चेयरमैन पर हाईकोर्ट के आदेशों की अवहेलना के गंभीर आरोप लगाते हुए डिप्टी कमिश्नर बरनाला को मांग पत्र सौंपा है। उन्होंने स्पष्ट किया कि यदि यहां इंसाफ़ नहीं मिला तो माननीय हाईकोर्ट का दरवाज़ा खटखटाया जाएगा।
दूसरी ओर, डिप्टी कमिश्नर बरनाला सरदार हरप्रीत सिंह ने कहा कि 25 एकड़ स्कीम में काटे गए पेड़ों का मामला उनके संज्ञान में है और इसकी उच्च स्तरीय जांच करवाई जाएगी।
माननीय पंजाब एवं हरियाणा हाईकोर्ट द्वारा जारी आदेशों के अनुसार बिना वन विभाग की पूर्व अनुमति, बिना पर्यावरणीय असेसमेंट और बिना निर्धारित कानूनी प्रक्रिया के किसी भी पेड़ को काटना या जड़ों से उखाड़ना स्पष्ट रूप से गैरकानूनी कृत्य है। ऐसी कार्रवाई भारतीय वन कानून, पर्यावरण संरक्षण अधिनियम और न्यायालय के आदेशों का सीधा उल्लंघन है।
यदि यह साबित होता है कि पेड़ बिना अनुमति काटे या उखाड़े गए हैं, तो संबंधित अधिकारियों के खिलाफ अदालत की अवमानना, आपराधिक ज़िम्मेदारी, विभागीय कार्रवाई और पर्यावरणीय क्षति की भरपाई तक की कार्यवाही बनती है। कानून के अनुसार कोई भी सार्वजनिक अधिकारी अपने पद की आड़ में कानून उल्लंघन से नहीं बच सकता।
इस मामले में निर्णायक सवाल ये हैं—
पेड़ काटने या उखाड़ने के लिए किस सक्षम प्राधिकारी की अनुमति जारी की गई?
वन विभाग द्वारा की गई असेसमेंट और स्वीकृति के दस्तावेज़ कहां हैं?
काटे गए पेड़ों की वास्तविक संख्या क्या है और उनकी नीलामी या नष्ट करने की कानूनी प्रक्रिया क्या अपनाई गई?
ये सभी तथ्य जांच के दायरे में हैं और यदि उल्लंघन सिद्ध होता है तो नगर सुधार ट्रस्ट बरनाला के जिम्मेदार अधिकारियों और चेयरमैन के खिलाफ कानून के अनुसार सख़्त कार्रवाई तय मानी जाएगी।
कानून की नज़र में कोई भी पद अदालत के आदेशों से ऊपर नहीं है।
— परमजीत सिंह कैरे


