सरदार शाम सिंह अटारीवाला की शहादत से मिलता इतिहास का सबक
— परमजीत सिंह कैरे
इतिहास केवल तिथियों और युद्धों का संग्रह नहीं होता; वह उन चरित्रों की गाथा भी होता है, जो अपने समय की आत्मा बन जाते हैं। सिख इतिहास में सरदार शाम सिंह अटारीवाला का नाम ऐसे ही महान योद्धाओं में शुमार है, जिनकी शहादत ने वीरता, निष्ठा और आत्मसम्मान की एक अमर मिसाल कायम की।
सन् 1846 में प्रथम सिख-अंग्रेज़ युद्ध अपने निर्णायक मोड़ पर था। बाहरी दुश्मन से मुकाबला करने वाली ख़ालसा शक्ति को सबसे बड़ा आघात भीतर से मिल रहा था। दरबारी राजनीति, स्वार्थ और गद्दारियों ने उस मजबूत राज्य को अंदर से खोखला कर दिया, जिसे महाराजा रणजीत सिंह ने अपनी दूरदर्शिता और पराक्रम से खड़ा किया था। इतिहास हमें बताता है कि कोई भी साम्राज्य बाहरी आक्रमण से पहले आंतरिक विघटन से टूटता है, और ख़ालसा राज भी इसी सच्चाई का शिकार हुआ।
ऐसे कठिन समय में सरदार शाम सिंह अटारीवाला का व्यक्तित्व एक उजली किरण की तरह सामने आता है। उन्होंने गुरु के चरणों में प्रण किया कि वे रणभूमि से कभी पीठ नहीं दिखाएँगे—या तो विजय लेकर लौटेंगे या शहादत प्राप्त करेंगे। यह संकल्प केवल एक सैनिक की प्रतिज्ञा नहीं थी, बल्कि उस ख़ालसाई परंपरा का प्रतीक था, जिसमें सम्मान जीवन से बड़ा माना जाता है।
10 फ़रवरी 1846 को सब्राओं का युद्ध हुआ। यह केवल दो सेनाओं की टक्कर नहीं थी, बल्कि विश्वास और विश्वासघात की भी लड़ाई थी। जब युद्ध अपने चरम पर था, तब सतलुज पर बना पुल टूट गया और ख़ालसा सेना की वापसी का रास्ता बंद हो गया। इस घटना ने युद्ध की दिशा ही बदल दी। परंतु इस संकट की घड़ी में भी सरदार शाम सिंह अटारीवाला पीछे नहीं हटे।
जब बारूद समाप्त हो गया, तब उन्होंने तलवार उठाई और दुश्मन की तोपों के सामने डट गए। वृद्धावस्था में भी उनका साहस युवाओं को लज्जित करने वाला था। अंततः वे लड़ते-लड़ते शहीद हो गए, और उनके शरीर पर सभी घाव सामने से लगे थे—यह प्रमाण था कि उन्होंने अंतिम क्षण तक पीछे मुड़कर नहीं देखा।
इतिहास में ऐसे उदाहरण विरले ही मिलते हैं, जब शत्रु भी किसी योद्धा की वीरता के आगे सिर झुका दे। अंग्रेज़ जनरलों ने सरदार शाम सिंह की बहादुरी को खुले शब्दों में स्वीकार किया और उनकी पार्थिव देह पूरे सम्मान के साथ सिखों को सौंप दी। यह सम्मान किसी पराजित सैनिक को नहीं, बल्कि एक सच्चे योद्धा को दिया गया था।
सब्राओं की लड़ाई राजनीतिक दृष्टि से भले ही ख़ालसा राज के पतन की शुरुआत बनी, लेकिन नैतिक और आत्मिक दृष्टि से यह एक अमर विजय थी। इस युद्ध ने इतिहास को यह संदेश दिया कि राज्य केवल तलवार की धार पर नहीं टिकते, बल्कि एकता, विश्वास और सच्ची नीयत पर टिके रहते हैं।
आज, जब हम सरदार शाम सिंह अटारीवाला की शहादत को याद करते हैं, तो यह केवल अतीत का स्मरण नहीं, बल्कि वर्तमान के लिए एक चेतावनी भी है। समाज और राष्ट्र तभी मजबूत रहते हैं, जब उनमें आंतरिक एकता और नैतिक शक्ति बनी रहती है। स्वार्थ, विभाजन और विश्वासघात किसी भी ताकतवर व्यवस्था को गिरा सकते हैं।
सब्राओं की मिट्टी आज भी गवाही देती है कि शहादत कभी हार नहीं होती। वह आने वाली पीढ़ियों के लिए साहस और आत्मसम्मान का दीपक बन जाती है। सरदार शाम सिंह अटारीवाला की शहादत उसी अमर प्रकाश की तरह है, जो इतिहास के अंधेरों में भी राह दिखाती


