लेखक: परमजीत सिंह कैरे
इतिहास इस बात का प्रत्यक्ष प्रमाण है कि जिस कौम (समुदाय) का अपना राज-काज नहीं होता, उसका अस्तित्व हमेशा खतरे की तलवार के नीचे लटका रहता है। आज जब हम 21वीं सदी के आधुनिक युग में खड़े हैं, तो हमें अपने अतीत के झरोखे में झाँककर यह देखना होगा कि हमारे पूर्वजों ने अपना खून-पसीना एक करके हमें क्या दिया था और हमने अपनी लापरवाही के कारण क्या-क्या खो दिया है। हमारा इतिहास कोई सामान्य इतिहास नहीं है, बल्कि सदियों की गुलामी के विरुद्ध लड़ी गई एक लंबी बगावत की दास्तां है। इस संघर्ष की नींव गुरु रविदास महाराज और भगत कबीर जी जैसे रहबरों ने उस दौर में रखी थी जब बोलने पर पाबंदियां थीं, फिर भी उन्होंने ‘बेगमपुरा’ और ‘समानता’ का ऐसा नारा दिया जिसने मानसिक गुलामी का डर निकाल दिया। इसी क्रांतिकारी कड़ी को आगे बढ़ाते हुए महात्मा ज्योतिराव फुले और माता सावित्री बाई फुले ने शिक्षा के वे बंद दरवाजे हमारे लिए खोले, जिनके माध्यम से हम सामाजिक गुलामी की जड़ों को काटने के काबिल हो सके।
मुक्ति का मार्ग और सत्ता की मास्टर चाबी
इस मुक्ति के मार्ग को संवैधानिक रूप देने वाले 20वीं सदी के मसीहा बाबा साहब डॉक्टर भीमराव अंबेडकर ने अपना पूरा परिवार और अपना सारा जीवन कौम के नाम कर दिया। उन्होंने हमें सिर्फ एक कानूनी किताब ही नहीं दी, बल्कि ‘वोट’ के रूप में वह अजेय हथियार दिया जिसकी कीमत एक राजा और एक मजदूर के लिए बराबर है। उनका ‘पढ़ो, जुड़ो और संघर्ष करो’ का नारा आज भी हमारे अस्तित्व की बुनियाद है। बाबा साहब ने पशुओं जैसी जिंदगी जीने के लिए मजबूर किए गए लोगों को ‘इंसान’ होने का मान बख्शा। बाबा साहब के बाद यदि किसी ने इस दबे-कुचले समाज को ‘बादशाह’ बनने का व्यावहारिक रास्ता दिखाया, तो वे थे माननीय कांशीराम जी। उन्होंने साइकिल पर लाखों किलोमीटर का सफर तय करके गाँव-गाँव जाकर सोई हुई कौम की ज़मीर को जगाया और सिखाया कि ‘जिसकी जितनी संख्या भारी, उतनी उसकी हिस्सेदारी’। उन्होंने हमें समझाया कि जब तक आप अपनी राजनीतिक शक्ति खुद पैदा नहीं करते, दूसरी पार्टियाँ आपको सिर्फ एक ‘वोट बैंक’ के रूप में इस्तेमाल करके आपका शोषण करती रहेंगी।
नेतृत्व की नैतिक गिरावट और तीखे सवाल!
परंतु आज बेहद अफसोस और चिंता की बात है कि कौम की बेड़ा डुबोने में जितना हाथ दुश्मन का है, उससे कहीं अधिक ‘आंतरिक गद्दारों’ का है। आज हमारे समाज का नेतृत्व करने वाले कई नेताओं से कुछ तीखे सवाल पूछना अनिवार्य हो गया है। यह सौदेबाजी कब बंद होगी? आप मंचों पर बाबा साहब का नाम लेकर ऊँचा-ऊँचा गरजते हो, लेकिन रात के अंधेरे में विरोधी पार्टियों के साथ मिलकर अपनी कोठियों के नींव के पत्थर रखते हो। जिस मजदूर की दिहाड़ी में से आप संगठन के लिए ‘फंड’ लेते हो, वह आज भी टूटी छत के नीचे सोने के लिए मजबूर है, जबकि आपकी लग्जरी गाड़ियाँ उस गरीब के खून-पसीने की कमाई का खुलेआम अपमान कर रही हैं। माननीय कांशीराम जी ने पूरी उम्र साइकिल पर गुजार दी, लेकिन आप कुछ ही वर्षों में करोड़पति कैसे बन गए? आज समाज में जितने घर नहीं हैं, उससे अधिक ‘संगठन’ और ‘अध्यक्ष’ पैदा हो गए हैं। यह कोई एकजुटता नहीं, बल्कि कौम को टुकड़े-टुकड़े करने की एक गहरी साजिश है जिसे समझना बहुत जरूरी है।
मुफ्तखोरी का जाल और राजनीतिक चेतना की आवश्यकता
मेरे दबे-कुचले भाइयों और बहनों, अब आपको भी जागना होगा। सरकारों द्वारा दी जाने वाली मुफ्तखोरी की रेवड़ियाँ—चाहे वह पाँच किलो अनाज हो या मुफ्त बिजली—आपके बच्चों के भविष्य को खरीदने का एक जाल हैं। क्या आपके बेशकीमती वोट की कीमत सिर्फ एक आटे की थैली रह गई है? हम गुरुपर्वों और विशेष दिवसों पर लाखों रुपये लंगर और डीजे पर फूंक देते हैं, लेकिन जब कौम के लिए स्कूल या लाइब्रेरी बनाने की बारी आती है, तो हमारी जेबें खाली हो जाती हैं। यह भावनात्मक गुलामी हमें कहाँ लेकर जाएगी? याद रखें, संघर्ष जीवन का हिस्सा है; एक बच्चे को भी दूध तब मिलता है जब वह रोता है और इंसान को जन्म लेने के समय भी माँ की कोख के अंदर संघर्ष करना पड़ता है। फिर हम सम्मान के साथ जीने के लिए घर बैठकर मुफ्त की सुविधाओं की प्रतीक्षा क्यों कर रहे हैं?
अगला लक्ष्य: अधिकारों की रक्षा से राज-काज तक
अब समय आ गया है कि हम ‘अधिकार’ और ‘क्रांति’ के अंतर को पहचानें। अधिकार वे हैं जिनके लिए हमें दूसरों के आगे अर्जियाँ देनी पड़ती हैं, लेकिन ‘क्रांति’ (राज-सत्ता) वह है जहाँ हम खुद फैसले लेने वाले बनते हैं। अधिकार माँगने से मिल सकते हैं, लेकिन राजनीतिक क्रांति सिर्फ अपनी संगठनात्मक शक्ति से ही सृजित की जा सकती है। हमारा लक्ष्य अब सिर्फ राज-काज होना चाहिए। शिक्षा को अपना सबसे बड़ा हथियार बनाओ, वोट की ताकत को पहचानो और उस नेता का पूर्ण बहिष्कार करो जो आपकी ज़मीर खरीदने की कोशिश करता है। जब तक हम जातियों-उपजातियों में बँटे रहेंगे, तब तक दूसरे हम पर राज करते रहेंगे। इसलिए ‘एक झंडा, एक लक्ष्य’ के नारे के नीचे इकट्ठे हो जाओ। बाबा साहब ने सत्य ही कहा था कि राजनीतिक शक्ति वह मास्टर चाबी है, जिससे हर तरह के ताले खोले जा सकते हैं। आइए, आज यह प्रण करें कि हम मुफ्त की थैलियों का मोह त्यागेंगे और माननीय कांशीराम जी की तरह सड़कों पर उतरकर अपने अधिकारों के रक्षक और राजसत्ता के खुद मालिक बनेंगे। याद रखें, अधिकारों की भीख माँगना बंद करें, क्योंकि सामाजिक परिवर्तन की असली क्रांति खैरात में नहीं मिलती, इसे अपने राज-काज के माध्यम से खुद सृजित करना पड़ता है!


