
लेखक: परमजीत सिंह कैरे (88721-81002)
बरनाला की पवित्र धरती पर बीते दिन जो मंजर देखने को मिला, उसने पंजाब के लोकतांत्रिक इतिहास पर एक ऐसा काला धब्बा लगा दिया है, जिसे मिटाना आसान नहीं होगा। लोकतंत्र का चौथा स्तंभ कही जाने वाली पत्रकारिता को कल पुलिस के पहरे और नजरबंदी की बेड़ियों में जकड़ कर यह साबित कर दिया गया कि हुकूमत अब सच्चाई से डरने लगी है। जब किसी राज्य का मुख्यमंत्री जन-पक्षीय सवालों से घबराकर सच्चे पत्रकारों को उनके घरों में कैद कर दे और अपने ही ‘चापलूसों’ के हाथों में माइक थमाकर ‘सवाल-जवाब’ का स्क्रिप्टेड खेल खेले, तो समझ लेना चाहिए कि सत्ता के पैरों तले से जमीन खिसक चुकी है।
पत्रकारिता: आईना या सरकारी प्रचार?
पत्रकारिता का असली मकसद सरकार की तारीफों के पुल बांधना नहीं, बल्कि जनता के दर्द को हुकूमत के बहरे कानों तक पहुंचाना होता है। लेकिन बरनाला में जिस तरह से ‘असली पत्रकारों’ को, जो जनता के मुद्दे उठाते हैं, रोका गया, उसने मुख्यमंत्री के ‘बदलाव’ के दावों की हवा निकाल दी है। क्या सवाल पूछने वालों को ‘बंदी’ बना लेना ही असली राजनीति है? क्या आलोचना सुनने का साहस हुकूमत में खत्म हो चुका है?
“रोसु न कीजै उतरु दीजै”: गुरबाणी के सिद्धांतों से भागती हुकूमत
मुख्यमंत्री भगवंत सिंह मान द्वारा पंजाब में ‘शुक्राना यात्रा’ निकाली जा रही है, जो साहिब श्री गुरु ग्रंथ साहिब जी के सत्कार के प्रति बनाए गए कानून के संबंध में है। लेकिन सवाल यह उठता है कि यह ‘शुक्राना’ किसका है? क्या मुख्यमंत्री ने कभी उस पवित्र वाणी के सिद्धांतों को समझा है, जिसका वे शुक्राना कर रहे हैं? गुरबाणी का फरमान है— “रोसु न कीजै उतरु दीजै” (क्रोध न करें, उत्तर दें)।
पर अफसोस! बरनाला की सड़कों पर गुरु के वचनों की सरेआम धज्जियां उड़ीं। जब पंजाब के हक की बात करने वाले युवा, भाना सिद्धू जैसे जुझारू चेहरे और वे निडर पत्रकार सवाल पूछने के लिए तैयार थे, तो सरकार ने ‘उत्तर’ देने के बजाय ‘रोष’ दिखाया और उन्हें नजरबंद कर दिया। गुरु साहिब का असली शुक्राना उनके बताए मार्ग पर चलने में है, न कि पुलिस के दमन और प्रशासनिक दबाव के जरिए लोगों की जुबान पर ताले लगाने में।
कलाकारी और सियासत का फर्क: जब रियल लाइफ भी ‘नाटक’ बन जाए
भगवंत मान निस्संदेह एक उच्च कोटि के कलाकार रहे हैं, जिनका पंजाबियों ने हमेशा सम्मान किया। लेकिन एक ‘कलाकार’ और एक ‘मुख्यमंत्री’ में बहुत बड़ा फर्क होता है। दुनिया के बड़े-बड़े कलाकार राजनीति में आए, लेकिन उन्होंने अपनी अदाकारी को पर्दे तक ही सीमित रखा। लेकिन यहाँ तो पूरे सूबे को ही ‘फिल्मी सेट’ बना दिया गया है।
जब मुख्यमंत्री लोगों से पूछते हैं, “क्या आपने कभी सीएम को इतने करीब से देखा है?” तो वे शायद भूल जाते हैं कि पंजाब की जनता ने उन्हें ‘दर्शन’ देने के लिए नहीं, बल्कि उनका ‘दर्द’ दूर करने के लिए चुना था। अपने ही खास बंदों को माइक थमाकर सवाल पूछवाना और खुद ही जवाब देना सिर्फ ‘आत्म-मुग्धता’ का एक ड्रामा है, पत्रकारिता नहीं। यह नाटक फिल्मी पर्दे पर तो शोभा दे सकते हैं, लेकिन पंजाब की हकीकी सड़कों पर नहीं।
मुख्यमंत्री जी, पंजाब एक जीता-जागता राज्य है, कोई फिल्मी सेट नहीं। यहाँ भूख, बेरोजगारी और सफाई सेवकों के संघर्षमयी मोर्चे हकीकत हैं, कोई ‘शूटिंग’ नहीं। अगर आप लोगों के सवालों का सामना करने की हिम्मत नहीं जुटा सकते, तो समझ लीजिए कि आपकी यह ‘सियासी अदाकारी’ अब फेल हो चुकी है। याद रखिएगा, लोकतंत्र में जनता ही ‘डायरेक्टर’ होती है और वह सब देख रही है कि कौन सचमुच गुरु के लड़ लगकर लोक-सेवा कर रहा है और कौन सिर्फ सत्ता की खातिर ड्रामे।
पत्रकारिता सच का आईना है, और यह जीवित रही है और जीवित रहेगी, चाहे आप जितनी मर्जी नजरबंदियां कर लें!


