
लेखक:-परमजीत सिंह कैरे (8872181002)
मानव सभ्यता के इतिहास में ‘घर’ को केवल चार दीवारों का मकान नहीं, बल्कि एक ऐसा पवित्र किला माना जाता रहा है जहाँ रिश्तों की वफादारी और नैतिकता का वास होता था। एक दौर वह था जब समाज के सबसे तिरस्कृत हिस्से, यानी तवायफें भी अपनी ‘बाजारी’ जिंदगी के नर्क से मुक्ति पाकर किसी घर की ‘पत्नी’ बनने के सपने देखती थीं। उनके लिए पति का नाम और घर की चौखट दुनिया का सबसे बड़ा सम्मान होता था। लेकिन आज के त्रासदी भरे दौर में तस्वीर इसके बिल्कुल उलट और भयानक हो चुकी है।
पवित्रता का कत्ल और बाजारीपन का दलदल
आज कथित ‘आजादी’ और ‘लिबरलिज्म’ (उदारवाद) के नाम पर नैतिकता का ऐसा घान हो रहा है जो रूह को कंपा देने वाला है। कितनी हैरानी और शर्म की बात है कि आज पति जैसे पवित्र रिश्ते की मौजूदगी में भी, हंसते-खेलते घरों की दहलीज लांघकर कुछ महिलाएं होटलों, रेस्तरां और क्लबों की मसनूई (नकली) रोशनी में खुद को नीलाम कर रही हैं। जब एक ‘पत्नी’ अपने वजूद और पारिवारिक मर्यादा को ताक पर रखकर रातों की रंगीनी में अपना किरदार खो देती है, तो वह सिर्फ एक रिश्ता नहीं तोड़ती, बल्कि समाज के उस विश्वास की नींव में तेजाब डालती है जिस पर सारा सामाजिक ढांचा खड़ा है।
मानसिक कंगाली या आधुनिकता?
क्या होटलों में रातें गुजारना और अपने आत्म-सम्मान को बाजारू बना देना ही आधुनिकता है? पश्चिमी संस्कृति की अंधी नकल और सोशल मीडिया के जरिए परोसे जा रहे झूठे ग्लैमर ने मानवीय मानसिकता को इतना कंगाल कर दिया है कि आज ‘घर’ की शांति के बजाय ‘बाजार’ की भटकन ज्यादा प्यारी लगने लगी है। रिश्तों की वफादारी अब कुछ लोगों के लिए सिर्फ एक ‘बोझ’ बनकर रह गई है। यह भटकाव सिर्फ देह का नहीं, बल्कि उस जमीर की मौत है जो इंसान को पशु से अलग करता है। जब मर्यादा की सीमा टूटती है, तो वह सिर्फ एक औरत या मर्द का पतन नहीं होता, बल्कि आने वाली पीढ़ियों के संस्कारों का सामूहिक कत्ल होता है।
सामाजिक कोढ़ और भविष्य का अंधेरा
यदि आज इस गंभीर विषय पर चिंतन नहीं किया गया, तो वह दिन दूर नहीं जब ‘परिवार’ नाम की संस्था सिर्फ इतिहास की किताबों में रह जाएगी। ऐसी घटनाएं समाज में एक ऐसा कोढ़ फैला रही हैं जिसका इलाज आने वाले कई दशकों तक संभव नहीं होगा। बच्चों के मन पर पड़ने वाला इसका प्रभाव उन्हें मानसिक रोगी बना रहा है। विश्वास का रिश्ता जब बाजार में बिकने लग जाए, तो समाज को बर्बाद होने से कोई नहीं बचा सकता।
हमें यह समझने की जरूरत है कि जो सुकून अपने घर की चौखट के भीतर और रिश्तों की वफादारी में है, वह दुनिया के किसी भी महंगे होटल या क्लब में नहीं मिल सकता। बाजारी रंगीनियां सिर्फ भटकन पैदा करती हैं, जबकि पारिवारिक मर्यादा हमें सम्मान देती है। अब समय है कि समाज का हर जागरूक नागरिक इस पतन के विरुद्ध आवाज बुलंद करे। हमें अपनी जड़ों की ओर लौटना होगा, अन्यथा हम आधुनिकता की इस अंधी दौड़ में अपनी रूह और अपना इतिहास दोनों खो देंगे।


