रचना: परमजीत सिंह कैरे
लोगों की करोड़ों की कोठियों के संगमरमर बड़े ठंडे हैं,
पर मेरी माँ की ‘चलानी’ (रसोई) में एक गर्मजोशी भरी ईश्वरीय महक है।
वहाँ दिखावे का कोई बाज़ारू पिंजरा नहीं टंगा,
फिर भी वहाँ रूहों की एक अजीब और पाक चहक है।
जब माँ बाहर से चक्कर लगाकर लौटती है,
तो आँगन के पौधों की टहनियाँ हिलने लगती हैं,
जैसे माँ के स्वागत में कुदरत सजदा कर रही हो।
वहाँ पक्षी सिर्फ ‘जानवर’ नहीं रह जाते,
वो तो माँ के पीछे ऐसे चलते हैं
जैसे माँ की पुरानी चुनरी के पल्ले से लटके मासूम बच्चे हों।
माँ जब चलानी में पैर रखती है,
तो बेज़ुबानों और ममता के बीच एक अनकही बातचीत शुरू होती है…
कोई चिड़िया माँ के कंधे पर बैठकर कान में सुख-साँद कहती है,
कभी कोई तोता और मैना आटे वाले कनस्तर के किनारे बैठकर हक से शोर मचाते हैं।
माँ अपनी मीठी झिड़की के साथ मुस्कुरा कर कहती है:
“लो आ गई मैं! बड़ी जल्दी है तुम्हें, थोड़ा सब्र तो करो!”
लोगों ने तो महंगे पिंजरे और दाने डालकर उनकी ‘परवाज़’ (उड़ान) छीन ली,
पर मेरी माँ ने उन्हें अपनी ममता की खुली ‘छाँव’ दे दी।
लोग यूनिवर्सिटी में पढ़कर पक्षियों पर पी.एच.डी. करते हैं,
पर मेरी अनपढ़ माँ के ‘अनुभव’ के आगे वो डिग्रियाँ भी घुटने टेकती हैं।
विद्वानों ने तो सिर्फ पक्षियों की नस्लें पढ़ी हैं,
पर मेरी माँ ने उनकी ‘रूहों’ को पढ़ा है।
उनकी पी.एच.डी. पिंजरों और फाइलों में रह गई,
पर माँ की ममता ने परिंदों को अपना ‘जाया’ (संतान) बना लिया।
देखो मेरी माँ का यह रूहानी अनुभव…
तुम्हारे कैदी पक्षी तो हर पल खिड़की खुलने का इंतज़ार करते हैं,
पर मेरी माँ के पक्षी, खुले आसमानों की बादशाही छोड़ कर
उसकी चलानी के धुएँ में भी जन्नत की खुशी ढूँढ लेते हैं।
वो पक्षी माँ के सीने की गर्माहट और उसके हाथों की बरकत जानते हैं।
वो जानते हैं कि यहाँ ‘मालिक’ और ‘गुलाम’ का कोई रिश्ता नहीं,
यहाँ तो बस एक माँ है… और उसके रूहानी बेज़ुबान बच्चे।
सबक बहुत बड़ा है: अगर रब की कुदरत को घर बुलाना है,
तो पिंजरे मत खरीदो, बल्कि अपने आस-पास पेड़ लगाओ।
जब तुम्हारी रूह में से सच्ची ममता की महक आएगी,
तो सारी कायनात खुद तुम्हारे पीछे-पीछे चलेगी।
”पिंजरे में बंद पक्षी सिर्फ ‘शोर’ करते हैं,
पर आज़ाद होकर माँ के कंधे पर बैठने वाले पक्षी ‘संगीत’ पैदा करते हैं।”
संपर्क: 88721-81002


