लेखक: परमजीत सिंह कैरे | संपर्क: 88721-81002
आज के वैज्ञानिक युग में भी यदि हमारा समाज ‘भविष्य’ बताने वाले स्वयंभू तथाकथित चमत्कारियों के जाल में फंस रहा है, तो यह हमारी सामूहिक बौद्धिक दरिद्रता का प्रमाण है। धनौला मंडी के कथित तांत्रिक मनप्रीत दास द्वारा तीन बच्चों की माँ को बहला-फुसलाकर घर बैठाने का मामला महज एक प्रेम-प्रसंग नहीं है, बल्कि यह एक गंभीर सामाजिक अपराध और कानूनी उल्लंघन है।
कानून की नज़रों में अपराधी
ऐसे पाखंडी यह भूल जाते हैं कि भारतीय कानून अंधविश्वास और शोषण के खिलाफ बहुत सख्त है। मनप्रीत दास जैसे लोगों पर निम्नलिखित कानूनी धाराओं के तहत शिकंजा कसा जा सकता है:
धारा 420 (धोखाधड़ी): लोगों को चमत्कारों का झांसा देकर पैसे लूटना।
धारा 366: किसी विवाहित महिला को अगवा करना या उसे अवैध संबंधों/शादी के लिए फुसलाना।
धारा 508: किसी व्यक्ति को यह विश्वास दिलाना कि यदि वह तांत्रिक की बात नहीं मानेगा, तो उस पर कोई ‘दैवीय प्रकोप’ या श्राप आ गिरेगा।
ड्रग्स एंड मैजिक रेमेडीज एक्ट (1954): जादू-टोने के जरिए इलाज का दावा करना एक दंडनीय अपराध है।
चरित्रहीनता का इतिहास: ‘जूता परेड’ से अस्पताल तक
इस मनप्रीत दास का अतीत बेहद दागदार रहा है। पहले भी ‘महिलाबाजी’ के चक्कर में इसकी कई बार ‘जूता परेड’ (पिटाई) हो चुकी है। एक बार तो इसकी पिटाई इतनी बेरहमी से हुई थी कि इसे अस्पताल जाकर होश आया था। पर अफ़सोस! बेशर्मी की हद देखिए कि जो व्यक्ति खुद जूते खाकर अस्पताल पहुँचता रहा हो, भोले-भाले लोग आज भी उसी के पास अपनी इज़्ज़त और पैसा लुटाने जा रहे हैं।
सामाजिक संगठनों की ‘रहस्यमयी’ चुप्पी
यहाँ एक बड़ा सवाल उन सामाजिक संगठनों पर भी उठता है जो समाज को साफ-सुथरा करने के दावे तो करते हैं, लेकिन ऐसे गंभीर मुद्दों पर चुप्पी साध लेते हैं।
क्या ये पाखंडी बाबा समाज में गंदगी नहीं फैला रहे?
क्या किसी गरीब के उजड़ रहे घर को बचाना इन संगठनों का फर्ज़ नहीं?
ऐसी संस्थाओं की चुप्पी पाखंडियों के हौसले बुलंद करती है। यदि आज हम इनके खिलाफ नहीं बोले, तो कल यह आग किसी और के घर तक भी पहुँच सकती है।
समाज के लिए खतरे की घंटी!
लोगों को अब जागने की ज़रूरत है। धर्म के नाम पर ये भेड़िये आपकी बहू-बेटियों की इज़्ज़त के साथ खेल रहे हैं।
पैसे की बर्बादी: ये पाखंडी आपकी खून-पसीने की कमाई पर ऐश करते हैं।
इज्ज़त की बर्बादी: इनके डेरे आध्यात्मिकता के नहीं, बल्कि शोषण के अड्डे बन चुके हैं।
समय की बर्बादी: मुसीबत का हल मेहनत और तर्क में है, पाखंड में नहीं।
निर्णायक सवाल
क्या हम अभी भी आँखें बंद करके इन ‘भेषधारी’ दरिंदों के पैरों में गिरते रहेंगे? प्रशासन और सामाजिक संगठनों को चाहिए कि मनप्रीत दास जैसे पाखंडियों पर ऐसी मिसाल कायम करने वाली कार्रवाई करें कि आगे से कोई भी धर्म की आड़ में किसी का घर उजाड़ने की हिम्मत न कर सके।
सामाजिक जागरूकता ही इस गंदगी का एकमात्र इलाज है। अपने परिवार और अपनी इज़्ज़त की रक्षा खुद करें और इन शिकारियों से बचें।


