
पत्रकार: परमजीत सिंह कैरे
लोकतंत्र की सबसे खूबसूरत और मजबूत कड़ी यह है कि यहाँ संविधान और कानून से ऊपर कोई नहीं है—ना कोई चुना हुआ प्रतिनिधि और ना ही कोई सरकारी अधिकारी। लेकिन बीते दिनों नगर परिषद चुनाव के दौरान धूरी में केंद्रीय मंत्री रवनीत सिंह बिट्टू और ड्यूटी पर तैनात एसएचओ (SHO) इंस्पेक्टर करनवीर सिंह संधू के बीच हुई तीखी बहस ने एक बार फिर देश के प्रशासनिक ढांचे, राजनीतिक मर्यादा और कानून के राज पर बड़े सवाल खड़े कर दिए हैं। यह घटना सिर्फ दो व्यक्तियों की आपसी बहस नहीं है, बल्कि राजनीतिक रसूख और कानूनी कर्तव्य के टकराव का एक बेहद संवेदनशील उदाहरण है।
राजनीतिक भाषा का पतन और संवैधानिक मर्यादा
एक लोकतंत्र में जनता द्वारा चुने गए प्रतिनिधियों और केंद्रीय मंत्री जैसे संवैधानिक पदों पर बैठे शख्स से समाज हमेशा उच्च नैतिकता और संयमित भाषा की उम्मीद करता है। जब सत्ता के नशे में कोई नेता ऑन-ड्यूटी लोक सेवक (Public Servant) के लिए अपमानजनक शब्दावली का इस्तेमाल करता है, तो वह न केवल एक व्यक्ति का अपमान करता है, बल्कि उस पूरी संस्था की साख को ठेस पहुँचाता है जिस पर कानून-व्यवस्था बनाए रखने की जिम्मेदारी होती है। यह प्रवृत्ति राजनीतिक अहंकार की उस मानसिकता को दर्शाती है जो वर्दी को देश का सेवक नहीं, बल्कि अपनी जागीर समझने की भूल कर बैठती है।
कानूनी पक्ष: ड्यूटी में बाधा और अधिकारों की सीमा
यदि इस पूरे घटनाक्रम को कानूनी चश्मे से देखा जाए, तो भारतीय न्याय संहिता (BNS) के तहत किसी भी सरकारी कर्मचारी को उसकी कानूनी ड्यूटी करने से रोकना, उसे डराना-धमकाऊना, सार्वजनिक रूप से अपमानित करना या उसकी मानहानि करना एक गंभीर आपराधिक दायरे में आता है। चुनाव के दौरान तैनात पुलिस अधिकारी सीधे चुनाव आयोग और संवैधानिक नियमों के प्रति जवाबदेह होता है, न कि किसी राजनीतिक दल या मंत्री के। ऐसे में, एक केंद्रीय मंत्री द्वारा कानून को अपने हाथ में लेकर पुलिस अधिकारी पर दबाव बनाना निष्पक्ष चुनाव प्रक्रिया की भावना के भी विपरीत है।
जब स्वाभिमान ने जगाई जवाबदेही की चिंगारी
इस पूरे हंगामे में सबसे महत्वपूर्ण और सकारात्मक पहलू इंस्पेक्टर करनवीर सिंह संधू का स्टैंड रहा। जहाँ अक्सर देखा जाता है कि पुलिस के उच्च अधिकारी अपनी तरक्कियों या राजनीतिक संरक्षण की खातिर नेताओं के आगे नतमस्तक हो जाते हैं और मूक दर्शक बनकर अपने जमीर का सौदा कर लेते हैं, वहीं इस युवा अधिकारी ने स्पष्ट कर दिया कि ‘वर्दी’ गुलामी का पट्टा नहीं है। उनका यह कहना कि “मैं एक सरदार का बेटा हूँ और ईमानदारी से अपनी ड्यूटी कर रहा हूँ”, यह दर्शाता है कि जब सिस्टम में नैतिकता और आत्म-सम्मान जिंदा हो, तो बड़ी से बड़ी राजनीतिक ताकत भी बौनी नजर आने लगती है।
उच्च अधिकारियों के लिए आत्म-चिंतन का समय
यह घटना पंजाब पुलिस के वरिष्ठ प्रशासनिक अधिकारियों (IPS और PPS) के लिए एक बड़ा सबक और आत्म-चिंतन का संदेश है। नौकरी करने का मतलब राजनीतिक आकाओं का ‘पिछलग्गू’ बनना नहीं है। यदि विभाग के मुखिया ही अपने अधीन काम करने वाले ईमानदार कर्मचारियों की पीठ पर नहीं खड़े होंगे, तो सिस्टम से निष्पक्षता खत्म हो जाएगी। आज अगर लोग सोशल मीडिया पर इस SHO को सैल्यूट कर रहे हैं, तो वे दरअसल खाकी के उस खो रहे रौब और सच्चाई को सैल्यूट कर रहे हैं जिसकी समाज को सख्त जरूरत है।
सार्थक संदेश और पत्रकारिता का नैतिक धर्म
एक जिम्मेदार समाज कभी भी अराजकता या टकराव का समर्थन नहीं करता। राजनीतिक नेताओं को यह समझना होगा कि सरकारें आती-जाती रहती हैं, लेकिन संविधान और संस्थाओं की मर्यादा अमर रहती है। यदि देश में कानून का राज कायम रखना है, तो राजनेताओं को अपनी जुबान पर लगाम और नौकरशाही को अपनी रीढ़ की हड्डी सीधी रखनी ही होगी।
आखिर में, बतौर पत्रकार हमारी यह सबसे बड़ी जिम्मेदारी बनती है कि हम बिना किसी पक्षपात, डर या लालच के इस सच को समाज के सामने रखें। हमारा मकसद किसी संस्था की अंधी निंदा करना बिल्कुल नहीं है। हम भली-भाँति जानते हैं कि राजनीति और पुलिस प्रशासन में आज भी ऐसे अनगिनत चेहरे मौजूद हैं जो पूरी ईमानदारी, देशभक्ति और ऊंचे अखलाक (नैतिकता) के साथ जनता की सेवा कर रहे हैं। दोनों तरफ अच्छे और बुरे लोग हमेशा रहते हैं, लेकिन जब कोई युवा अधिकारी सच और कर्तव्य की खातिर राजनीतिक अहंकार के सामने सीना तानकर खड़ा होता है, तो उस सच को लिखना और समाज तक पहुँचाना ही पत्रकारिता का असली धर्म और हक है। कलम की यह आवाज किसी के विरोध में नहीं, बल्कि लोकतंत्र की सलामती के लिए एक जिम्मेदारी की पुकार है।


