
परमजीत सिंह कैरे: 8872181002)
17 जून 2026 की वह दोपहर बिहार के भोजपुर (शाहपुर) जिले के बिलौटी गांव के लिए एक ऐसा खूनी इतिहास लिख गई, जिसने पूरे देश की रूह को कंपा कर रख दिया है। 28 वर्षीय युवक भरत भूषण तिवारी की पुलिस और एसटीएफ (STF) के हाथों हुई मौत को सरकारी फाइलों में ‘कामयाब मुठभेड़’ (Encounter) का नाम दिया गया। लेकिन डिजिटल युग के कैमरे ने खाकी की इस लिखी-लिखाई ‘स्क्रिप्ट’ के परखच्चे उड़ा कर रख दिए हैं। सोशल मीडिया पर वायरल हुए फेसबुक लाइव वीडियो ने सूबे के कानून के राज को आईना दिखाते हुए एक सीधा और तीखा सवाल दाग दिया है—जब उसने आत्मसमर्पण कर दिया था, तो गोली क्यों मारी गई?
यह लेख किसी अपराध की वकालत नहीं है, बल्कि वर्दी की आड़ में खेले गए उस खूनी खेल का पर्दाफाश है जो अदालतों को ताले लगाकर सड़कों पर ‘ऑन-द-स्पॉट इंसाफ’ करने की फासीवादी और अलोकतांत्रिक मानसिकता से उपजा है।
पुलिस की कहानी बनाम कैमरे की जुबानी
घटना के तुरंत बाद बिहार पुलिस ने हमेशा की तरह एक घिसा-पिटा आधिकारिक बयान जारी किया—”एक सिरफिरे अपराधी ने पुलिस पर 8 से 10 राउंड फायर किए, जवाबी कार्रवाई में पुलिस ने आत्मरक्षा (Right to Private Defense) में गोली चलाई, जो उसके पैर में लगी।” यह वही पारंपरिक और घिसी-पिटी कहानी है जो पिछले कई दशकों से हर संदिग्ध एनकाउंटर के बाद जनता को थमा दी जाती है ताकि वर्दी की साख बची रहे।
लेकिन इस बार पुलिस यह भूल गई कि वर्दी की दहशत से ज्यादा डिजिटल क्रांति के इस दौर में मोबाइल के कैमरे की आंख ताकतवर होती है। वायरल वीडियो ने पुलिस के हर एक दावे को सरेआम झूठा साबित कर दिया है:
दावा: भरत पुलिस पर अंधाधुंध फायरिंग कर रहा था।
सच्चाई: वीडियो में साफ देखा जा सकता है कि गोली चलने से ठीक पहले भरत ने अपनी पिस्टल जमीन पर फेंक दी थी। वह पूरी तरह निहत्था होकर पुलिस के सामने आत्मसमर्पण (Surrender) करने की मुद्रा में खड़ा था।
जब एक आरोपी हथियार डाल चुका हो, कानून के सामने घुटने टेकने को तैयार हो, तो उसे जिंदा पकड़कर जेल की सलाखों के पीछे भेजने के बजाय उस पर गोलियां बरसाना पुलिस की मजबूरी नहीं, बल्कि सीधे तौर पर न्यायिक हत्या (Extrajudicial Killing) है। पैर में गोली लगने के बावजूद अस्पताल ले जाने में हुई संदिग्ध देरी यह साफ इशारा करती है कि इरादा सिर्फ काबू पाना नहीं, बल्कि किस्सा ही खत्म करना था।
सोशल एक्टिविस्ट का बागी होना और सिस्टम का अंधापन
भरत भूषण तिवारी कोई पेशेवर गैंगस्टर, इनामी डकैत या अंतरराष्ट्रीय तस्कर नहीं था। वह एक पढ़ा-लिखा स्नातक (Graduate) युवक था, जो इलाके में भ्रष्टाचार के खिलाफ और बाढ़ पीड़ितों के हक के लिए हमेशा मुखर रहता था। हां, यह सच है कि घटना से एक-दो दिन पहले उसने फेसबुक पर हथियार लहराकर एक प्रशासनिक अधिकारी (SDM) को धमकी दी थी, जो कि कानूनी तौर पर एक गंभीर और अक्षम्य अपराध था।
लेकिन सवाल यह है कि क्या सोशल मीडिया पर गुस्सा निकालने वाले या व्यवस्था की कमियों से तंग आकर मानसिक तनाव से जूझ रहे किसी युवक को सीधे मौत के घाट उतार देना ही सभ्य समाज का समाधान रह गया है? यदि आधुनिक हथियारों से लैस पुलिस और एसटीएफ के पास एक निहत्थे हो चुके युवक को जिंदा काबू करने की पेशेवर क्षमता (Professional Capability) नहीं थी, तो फिर जनता के टैक्स के करोड़ों रुपये खर्च करके दी जाने वाली ट्रेनिंग किस काम की?
जख्मों पर नमक: पीड़ित परिवार पर ही FIR
इस पूरे घटनाक्रम में प्रशासनिक क्रूरता तब शर्मनाक हदों को पार कर गई, जब जनता के भारी आक्रोश और विरोध-प्रदर्शनों को देखते हुए मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी ने आनन-फानन में हाई कोर्ट के सेवानिवृत्त जज की अगुवाई में न्यायिक जांच (Judicial Probe) के आदेश दिए और थानाध्यक्ष (SHO) समेत 4 पुलिसकर्मियों को सस्पेंड कर दिया। लेकिन दूसरी ही तरफ, पुलिस ने अपना पुराना ढर्रा अपनाते हुए मृतक भरत के बुजुर्ग पिता और भाई सहित परिवार के अन्य सदस्यों पर ही गंभीर धाराओं के तहत मुकदमा दर्ज कर दिया।
एक परिवार जिसने खाकी की गोली के कारण अपना जवान बेटा खो दिया, जिसके घर का चिराग हमेशा के लिए बुझ गया, उसी को मुकदमों के जाल में उलझाकर चुप कराने की यह कोशिश प्रशासनिक गुंडागर्दी और तानाशाही नहीं तो और क्या है? यह साफ तौर पर अपनी नाकामी छुपाने और सच की आवाज को कानूनी आतंक से दबाने का घिनौना प्रयास है।
’यूपी मॉडल’ की अंधी नकल और सियासी फायदा
बिहार की मौजूदा सियासत में इन दिनों पड़ोसी राज्यों के ‘एनकाउंटर कल्चर’ यानी ‘यूपी मॉडल’ की नकल करने की एक खतरनाक और अंधी दौड़ चल रही है। राजनीतिक आका अपनी प्रशासनिक विफलताओं और राज्य में बढ़ते असल अपराधों पर पर्दा डालने के लिए पुलिस को ‘लाइसेंस टू किल’ (मारने की खुली छूट) देकर अपनी पीठ थपथपाते हैं।
सुप्रीम कोर्ट ने पी.यू.सी.एल. (PUCL) बनाम महाराष्ट्र राज्य के ऐतिहासिक मामले में एनकाउंटर से जुड़े 16 सख्त दिशानिर्देश (Guidelines) जारी किए हुए हैं, जिनकी बिलौटी गांव में सरेआम धज्जियां उड़ाई गईं। अगर जिंदा भरत अदालत के सामने आता, तो शायद वो इस भ्रष्ट व्यवस्था और पुलिस-प्रशासन के कई सफेदपोश चेहरों को बेनकाब कर देता, शायद इसी डर ने उसकी जान ले ली।
निष्कर्ष: यदि आज हम खामोश रहे…
भरत भूषण तिवारी का यह मामला अब देश की सर्वोच्च अदालत (सुप्री कोर्ट) की दहलीज तक जा पहुंचा है। वायरल वीडियो के रूप में अकाट्य सत्य पूरी दुनिया के सामने है। अगर इस मामले में वर्दी के पीछे छिपे गुनहगारों को सख्त सजा नहीं मिली और दोषियों के खिलाफ धारा 302 (हत्या) के तहत ठोस कार्रवाई नहीं हुई, तो यह मान लिया जाएगा कि इस देश में संविधान और कानून की किताबें सिर्फ अदालती कमरों की शोभा बढ़ाने के लिए हैं।
अगर बंदूक की नोंक पर ही न्याय होना है, अगर पुलिस ही जज और जल्लाद की भूमिका खुद तय करने लगेगी, तो कल को किसी भी आम नागरिक की जान सुरक्षित नहीं बचेगी। आज सवाल सिर्फ भरत तिवारी नाम के एक युवक का नहीं है, सवाल हमारे लोकतंत्र और न्याय प्रणाली के जिंदा रहने का है। बिहार सरकार और न्यायपालिका को यह साबित करना होगा कि देश में आज भी कड़े फैसले बंदूक की नली से नहीं, बल्कि संविधान के निष्पक्ष तराजू से ही तय होते हैं।


