
लेखक: परमजीत सिंह कैरे
आज के दौर में जब रसोई गैस सिर्फ एक सुविधा नहीं बल्कि जीने की बुनियादी जरूरत बन चुकी है, तब केंद्र और राज्य सरकारों की ओर से चल रही बयानबाजी किसी भद्दे मजाक से कम नहीं लगती। एक तरफ दिल्ली के आलीशान दफ्तरों में बैठे हुक्मरान गैस की किल्लत को महज “अफवाह” करार देकर पल्ला झाड़ रहे हैं, और दूसरी तरफ पंजाब की सियासत सिर्फ ‘हिदायतें’ जारी करने तक सीमित होकर रह गई है। सवाल यह है कि अगर गैस की कोई कमी नहीं है, तो बरनाला की गलियों से लेकर पंजाब के गांवों तक आम आदमी सिलेंडर के लिए दर-दर की ठोकरें क्यों खा रहा है?
केंद्र का ‘सब अच्छा है’ का राग और महंगाई की कुल्हाड़ी
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और केंद्रीय पेट्रोलियम मंत्रालय का यह कहना कि देश के पास पर्याप्त स्टॉक मौजूद है, जनता के जख्मों पर नमक छिड़कने के बराबर है। अगर स्टॉक भरपूर है, तो मार्च महीने की शुरुआत में ही सिलेंडर की कीमतों में भारी बढ़ोतरी करके जनता की कमर क्यों तोड़ी गई? क्या यह “अफवाहों” को रोकने का सरकारी तरीका है कि कीमतें इतनी बढ़ा दी जाएं कि गरीब इंसान सिलेंडर मांगना ही छोड़ दे? उज्ज्वला योजना की सब्सिडी के दावे अब हजार रुपये के करीब पहुंच चुकी कीमत के सामने बौने साबित हो रहे हैं। क्या सरकारों को यह अहसास नहीं है कि रसोई का बजट बिगड़ने से एक आम परिवार की रात की नींद उड़ जाती है?
पंजाब सरकार: बयानों की सख्ती या सिर्फ कागजी कार्यवाही?
मुख्यमंत्री भगवंत मान की ओर से कालाबाजारी के खिलाफ दी गई चेतावनियां सुनने में तो बहुत ‘कड़वी’ लगती हैं, लेकिन जमीनी हकीकत कुछ और ही बयां करती है। बरनाला के डिप्टी कमिश्नर (DC) और जिला खाद्य एवं आपूर्ति नियंत्रक (DFSC) को जारी किए गए आदेश फाइलों में तो अच्छे लगते हैं, लेकिन क्या किसी अधिकारी ने शहर की उन तंग गलियों या गांवों के गोदामों का दौरा किया है जहां गैस एजेंसियों के करिंदे सिलेंडर ‘पीछे’ रखकर काली कमाई कर रहे हैं? जब तक प्रशासन सिर्फ चेतावनियां देने के बजाय एजेंसियों के स्टॉक रजिस्टरों की असल चेकिंग नहीं करता, तब तक यह ‘सख्ती’ सिर्फ अखबारी सुर्खियों से ज्यादा कुछ नहीं।
एजेंसियों की मनमानी और प्रशासन की ‘मौन’ सहमति
गैस की सप्लाई में देरी होना अब एक आम बात बन गई है। एजेंसियों की ओर से जानबूझकर की जाने वाली देरी और फिर “इमरजेंसी” के नाम पर अतिरिक्त पैसे वसूल कर सिलेंडर उपलब्ध करवाना एक बड़ा माफिया बन चुका है। क्या यह मान लिया जाए कि बरनाला प्रशासन की नाक के नीचे हो रही इस लूट में सबकी मिलीभगत है? अगर नहीं, तो अब तक कितने ऐसे गैस डीलरों के लाइसेंस रद्द किए गए हैं जो जनता को गुमराह कर रहे हैं? स्थानीय खाद्य आपूर्ति विभाग के इंस्पेक्टर फील्ड में निकलने के बजाय दफ्तरों तक क्यों सीमित हैं?
जनता को बयान नहीं, जलता चूल्हा चाहिए!
सरकारों को अब यह समझ लेना चाहिए कि भाषणों से रोटी नहीं पकती और न ही ट्विटर (X) पर दी गई चेतावनियों से सिलेंडर भरते हैं। केंद्र सरकार वैश्विक स्तर के संकटों का बहाना बनाकर पल्ला झाड़ रही है और राज्य सरकार सारी गलतियां केंद्र पर मढ़कर अपनी जिम्मेदारी से मुक्त होना चाहती है। इस सियासी फुटबॉल के खेल में आम जनता पिस रही है। जनता को सिर्फ वाजिब रेट पर और सही समय पर सिलेंडर चाहिए। अगर प्रशासन अभी भी नहीं जागता, तो जनता का गुस्सा आने वाले समय में सरकारों के लिए महंगा साबित हो सकता है।


