
परमजीत सिंह कैरे:
बरनाला: बरनाला नगर निगम चुनाव के लिए नामांकन के आखिरी दिन जहां जिला प्रशासनिक परिसर (DAC) में राजनीतिक नेताओं के काफिले, नारेबाजी और शक्ति प्रदर्शन पूरे शबाब पर हैं, वहीं शहर की जमीनी हकीकत कुछ और ही दर्दनाक तस्वीर बयां कर रही है। एक तरफ सत्ता हथियाने के लिए एड़ी-चोटी का जोर लगाया जा रहा है, तो दूसरी तरफ शहर की जनता और सिस्टम की रीढ़ की हड्डी कहे जाने वाले ‘सफाई सैनिक’ प्रशासनिक बेरुखी का दंश झेल रहे हैं।
6 मई से जारी सफाई सेवकों का संघर्ष: हक की लड़ाई और हुक्मरानों की बेरुखी
इस चुनावी चमक-दमक के पीछे सबसे बड़ा और कड़वा सच यह है कि बीते 6 मई से नगर निगम दफ्तर के आगे अपनी जायज मांगों को लेकर सफाई सेवक पक्के मोर्चे पर बैठे हैं। तपती गर्मी में दिन-रात धरने पर बैठे इन कर्मचारियों की सुनवाई न होने के कारण, उनके द्वारा अनिश्चितकालीन हड़ताल ने पूरे प्रशासनिक ढांचे की हवा निकाल दी है।
सफाई सैनिक यूनियन का पक्ष बेहद दर्दनाक और सिस्टम को शर्मसार करने वाला है। उनका साफ कहना है कि जो हाथ रोजाना पूरे शहर की गंदगी साफ करके लोगों को बीमारियों से बचाते हैं, आज वही हाथ अपने रोजगार और इंसाफ के लिए हुक्मरानों के आगे फैले हुए हैं। लेकिन अफसोस, चुनाव के इस महाकुंभ में भी सत्ताधारी दल और उच्च अधिकारियों के कान पर जूं तक नहीं रेंग रही, जिससे इन मेहनतकशों में भारी रोष है।
महामारी के मुहाने पर बेबस वोटर: जनता की कचहरी में नेताओं की परीक्षा
इस हड़ताल के कारण आज बरनाला का कोई ऐसा बाजार, गली या मोड़ नहीं बचा है जहां कचरे के पहाड़ न खड़े हों। शहर के अंदर भयानक बीमारियां फैलने का खौफ पल-पल बढ़ रहा है, जिससे आम लोगों का जीना मुहाल हो चुका है। यहां शहर के वोटरों का रुख बेहद निराशाजनक और गुस्से से भरा हुआ है। शहर वासियों का तीखा सवाल है कि वोटों के लिए घर-घर चक्कर काटने वाले इन नेताओं को शहर की यह बदबू और नरक जैसे हालात क्यों दिखाई नहीं देते?
जिस शहर की जनता कचरे के ढेरों पर बैठकर महामारी के डर के साए में जी रही हो, वहां विकास और साफ-सुथरे प्रशासन के बड़े-बड़े दावे सिर्फ एक भद्दा मजाक प्रतीत होते हैं। वोटरों का कहना है कि जो सिस्टम चुनाव के दिनों में भी शहर को इस बड़ी मुसीबत से नहीं निकाल सकता, उसे सत्ता में रहने का कोई अधिकार नहीं है।
वोट के हथियार से होगा फैसला
बरनाला नगर निगम के यह चुनाव सिर्फ राजनीतिक पार्टियों की हार-जीत का फैसला नहीं करेंगे, बल्कि यह बरनाला के वोटरों के सब्र और सफाई सेवकों के संघर्ष का परिणाम भी तय करेंगे। अगर सत्ताधारी दल या विपक्षी नेता सफाई सेवकों के इस दर्द और शहर की इस बदहाली को नजरअंदाज करके सिर्फ अपनी राजनीतिक रोटियां सेंकने में मस्त हैं, तो वे शायद शहर के वोटरों के अंदर सुलग रहे गुस्से से अनजान हैं। अब गेंद जनता के पाले में है, जो चुनाव वाले दिन अपने ‘वोट के हथियार’ से इस बदबूदार सिस्टम और लापरवाह नेताओं को आईना दिखाने के लिए तैयार बैठी है।


